जम्मू – कश्मीर: उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले के लहरवालपोरा गांव में मछुआरे दशकों से धूप में सुखाई गई मछली बनाते आ रहे हैं जिनका सेवन पूरी सर्दियों में इस सारे इलाके में किया जाता था। इन मछलियों को स्थानीय बाजारों में बेचा जाता था, लेकिन अब दशकों पुरानी यह परंपरा तेजी से विलुप्त के कगार पर है। इसका कारण वुलर झील में प्रदूषण और स्वच्छ पर्यावरण की कमी बन रहा है। इसके चलते मछलियों की उपलब्धता में निरंतर कमी आती जा रही है।

हॉगार्ड के नाम से जानी जाने वाली इन मछलियों को स्थानीय बाजारों में बेचने से पहले सुखाया जाता है। खासकर सर्दियों में इसकी मांग में बढ़ोत्तरी हो जाती है। लेकिन अब स्थिति यह है कि प्लास्टिक से उत्पन्न प्रदूषण, घरेलू कचरे और झील में पानी के घटते स्तर से, एशिया की सबसे विशाल मीठे पानी की झील में, मछलियों के प्रजनन पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ रहा है। गांव में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के चलते वुलर झील में मछलियों की संख्या घटने से धूप में सुखाई जाने वाली मछली की परंपरा संकट में दिखाई दे रही है। इस काम में पर्याप्त कमाई न होने के कारण अब मछुआरे अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरीवश दूसरे कार्यों का रुख कर रहे हैं।

प्रदूषण के कारण झील में मछलियों के घटते स्तर से, मछली सुखाने की यह पारंपरिक प्रथा अब आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रही है। झील हर साल सिकुड़ती जा रही है जिससे मछलियों की उपलब्धता तेजी से घट रही है। पूर्व में यहां लगभग प्रत्येक परिवार मछली पकड़ने और धूप में मछली सुखाने का काम करता था। अब केवल कुछ बुजुर्ग लोग ही इस प्रथा को जीवित रखे हुए हैं। धूप में सुखाई गई मछली तैयार करने के लिए मछलियों को रस्सियों से बांधकर बाहर लटकाने के बाद लगभग तीन सप्ताह तक लगातार धूप की जरूरत होती है। लेकिन अब मछली पकड़ने में कमी और अप्रत्याशित जलवायु परिवर्तन से इस प्रक्रिया को समाप्त सा कर दिया है।

गांव का युवा वर्ग अनिश्चितता और कम कमाई के कारण मछली पकड़ने का काम धीरे-धीरे पूरी तरह से छोड़ रहा है। वुलर में बढ़ते प्रदूषण और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाने से मछलियों की संख्या घटती जा रही है। तमाम तरह के जागरूकता कार्यक्रमों के चलाए जाने के बाद भी वुलर झील में कचरा फेंकने की प्रथा बंद नहीं हुई है। इसका सीधा नुकसान जल के जीवों और वनस्पतियों को हो रहा है और साथ ही इसका असर मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। इस गांव की पहचान इसकी मछली पकड़ने की संस्कृति से ही है। अगर इसी तरह  झील की स्थिति खराब होती रही तो यह परंपरा पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगी।

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