उत्तर प्रदेश : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर विशेषज्ञ और मैनपावर के अभाव में बंद पड़े हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि गंभीर बीमार मरीज वेंटिलेटर के लिए एक से दूसरे अस्पताल के बीच दौड़ लगाने में अपनी जान गंवा रहे हैं। साथ ही पीजीआई, केजीएमयू और लोहिया संस्थान मरीजों का दबाव ज्यादा होने की समस्या से जूझ रहे हैं।
गोरखपुर से रेफर होकर लखनऊ आए देवरिया के एक मरीज को समय से वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो सका नतीजतन उसकी जान चली गई। यह दुखद घटना राजधानी के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। कई समाचार पत्रों में पूर्व में भी इस मामले में खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं। खबर छपने के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में तो आता है, लेकिन कुछ दिन बाद फिर से स्थिति पहले जैसी हो जाती है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राजधानी के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर विशेषज्ञ और मैनपावर के अभाव में बंद पड़े हैं। गंभीर रूप से बीमार मरीज वेंटिलेटर के लिए एक से दूसरे अस्पताल के बीच दौड़ लगाने में अपनी जान को दांव पर लगा रहे हैं परंतु जिम्मेदारों की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। वह आंखे मूंद कर बैठे हैं।
राजधानी का लोकबंधु अस्पताल 300 बेड की क्षमता वाला अस्पताल है। यहां पर 40 वेंटिलेटर हैं लेकिन इनमें से मात्र 10 वेंटिलेटर पर ही मरीजों की भर्ती हो रही है, बाकी बंद पड़े हैं। इसकी वजह यह है कि बीते वर्ष हुए अग्निकांड के बाद आईसीयू का निर्माण कार्य अभी तक पूर्ण नहीं हो पाया है। इस वजह से सीमित वेंटिलेटर पर ही मरीजों को भर्ती किया जा रहा है।
बलरामपुर अस्पताल में 60 वेंटिलेटर बेड हैं जिसमें से सिर्फ 28 ही का संचालन हो पा रहा है। मैनपावर व विशेषज्ञों का संकट होने की वजह से पूरी क्षमता के साथ मरीजों को वेंटिलेटर का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
कुछ ऐसा ही हाल ठाकुरगंज व रानी लक्ष्मीबाई अस्पतालों का है। ठाकुरगंज में 2 और रानी लक्ष्मीबाई में पांच वेंटिलेटर हैं लेकिन इन पर मरीजों की नियमित रूप से भर्ती नहीं हो पा रही है। विशेषज्ञ डॉक्टर व संसाधनों की कमी के चलते सभी वेंटिलेटर बेड का संचालन सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा है।
पीजीआई समेत दूसरे मेडिकल संस्थानों में करीब 500 वेंटिलेटर हैं और यहां लगभग पूरे प्रदेश और बिहार से भी मरीज आते हैं। इस वजह से यहां उपलब्ध वेंटिलेटरों के मुकाबले मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा रहता है और गंभीर मरीजों को आसानी से वेंटिलेटर उपलब्ध हो पाने में दिक्कत आती है।
सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों को इलाज मुफ्त में मुहैया कराया जाता है जबकि इसके लिए केजीएमयू, पीजीआई व लोहिया संस्थान में प्रतिदिन 10 से 20 हजार रुपए का खर्च आता है। अगर बात निजी अस्पताल की करें तो उनमें वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों को प्रतिदिन एक से डेढ़ लाख रुपए चुकाने पड़ते हैं। ऐसे में गरीब मरीजों के लिए सरकारी अस्पताल या चिकित्सा संस्थान की एकमात्र सहारा और विकल्प रह जाता है।
