उत्तर प्रदेश: बसपा आज भले ही अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती दिख रही हो, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने 70वें जन्मदिवस पर लखनऊ में कार्यकर्ताओं और समर्थकों में जोश भरने का कार्य किया। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं में नई उमंग का संचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मायावती ने दलितों, पिछड़ों और उपेक्षित वर्गों के मान-सम्मान के लिए अपनी जिंदगी समर्पित करने का वादा किया।उन्होंने कहा कि जब तक मैं जीवित रहूंगी, मेरा संघर्ष जारी रहेगा।
मायावती ने बताया कि उनका स्वास्थ्य ठीक है और वह बसपा के संस्थापक कांशीराम की एकमात्र उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी को कमजोर करने की साजिशों का मुकाबला करने के लिए वह पूर्णरूप से सक्षम हैं। उन्होंने अपने विरोधी दलों द्वारा बसपा को खत्म करने की साजिश रचे जाने पर चेतावनी दी। साथ ही उन्होंने बीते दिनों गुटबाजी करने वाले कुछ पदाधिकारियों को भी सख्त संदेश दिया कि पार्टी की कमान उनके मजबूत हाथों में ही बनी रहेगी।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने जन्मदिन के अवसर पर एक बार फिर अपने संकल्पों को दोहराया और कहा कि मैं कभी झुकने वाली नहीं हूं । उन्होंने कहा कि किसी दबाव या लालच में पार्टी के मूवमेंट से पीछे नहीं हटूंगी। उन्होंने आशा जताई कि इस कार्य में पार्टी के लोग भी उन्हें निराश नहीं होने देंगे। अपने मूल दलित वोट बैंक के साथ मायावती ने उन जातियों का जिक्र भी किया जो बीते कुछ समय से सियासी चर्चाओं में हैं। मायावती के संबोधन में उनकी आयरन लेडी की पुरानी झलक दिखाई दी, जो कार्यकर्ताओं में नई उत्साह का संचार कर सकती है।
उन्होंने सपा के पीडीए पर निशाना साधते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार में पिछड़े वर्गों के आरक्षण का लाभ भी इनका खुद का समाज ही उठाता रहा है और मुस्लिम समाज को उपेक्षा सहनी पड़ी है। मायावती ने विश्वास जताया कि इस बार दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज का वोट पहले से कहीं ज्यादा बसपा को ही मिलेगा।
वर्तमान में बसपा कई मुश्किलों से घिरी है। उसका राष्ट्रीय पार्टी होने का तमगा खतरे में है और राज्यसभा में भी इस बार उनकी उपस्थिति नहीं रहेगी। विधानसभा में भी बसपा के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह हैं। मौजूदा हालातों में पार्टी को अपना वजूद बचाए रखने के लिए अपने सबसे कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है। हालांकि बसपा ने अन्य राज्यों के निकाय चुनाव में सफलता जरूर हासिल की है और पार्टी ने प्रदेश में भी अपने जनाधार बढ़ाया है। देखना दिलचस्प होगा कि जातियों को बसपा के साथ जोड़ने की उनकी यह रणनीति कितनी कारगर साबित होती है। उनकी इस कवायद का परिणाम तो वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में ही देखने को मिलेगा।
