नई दिल्ली: विश्व रेडियो दिवस एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में हर साल 13 फरवरी को मनाया जाता है। साल 2011 में इसका प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आम सभा में पारित किया गया था। रेडियो दिवस मनाए जाने का मुख्य उद्देश्य रेडियो को सूचना, मनोरंजन और शिक्षा के रूप में जनमानस तक पहुंचाना है।

बीते जमाने में मन को बहलाने और संगीत के लिए रेडियो ही मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करता था। हिंदी फिल्मों के गीतों का चलन तब ज्यादा बढ़ा , जब रेडियो पर इनका प्रसारण होना शुरू हुआ। इसके बाद रेडियो की लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी होती चली गई। बिनाका गीत माला, जोकि रेडियो सिलोन श्रीलंका से प्रसारित होती थी, के दीवानों की संख्या सबसे ज्यादा थी। समय के साथ संसाधन बदलते चले गए और उनमें परिवर्तन आता चला गया। मौजूदा समय में एफएम रेडियो का प्रचलन प्रारंभ हुआ, जिसने रेडियो के संगीत और उसके तौर तरीके को ही बदल कर रख दिया। एफएम रेडियो ने मनोरंजन के क्षेत्र में नई क्रांति का संचार किया है।

रेडियो का आविष्कार 1895 में इटली के वैज्ञानिक गूगलिएल्मो मार्कोनी ने किया था। रेडियो के अविष्कार के लिए 1909 में मार्कोनी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपने आविष्कार के तीन दशक बाद 1927 में भारत में पहला रेडियो स्टेशन इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के नाम से मुंबई में शुरू हुआ। 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया और फिर इसे आकाशवाणी के नाम से  जाना जाने लगा।

इंदौर में आकाशवाणी रेडियो स्टेशन की स्थापना मई 1952 में हुई थी। 1976 में यहां विविध भारती का प्रसारण केंद्र बना जिसे बाद में एफएम में तब्दील कर दिया गया। अक्टूबर 2001 में नगर में पहला निजी रेडियो एफएम रेडियो मिर्ची आरंभ हुआ था।

रेडियो सिलोन की बिनाका गीतमाला आज भी कई लोगों को इसलिए याद है क्योंकि आवाज के जादूगर विश्वविख्यात एंकर अमीन सयानी इस कार्यक्रम को प्रस्तुत करते थे। इस पर बजने वाला कौन सा गीत किस पायदान पर है, यह जानने में लोगों में चाहत रहा करती थी। रेडियो पर प्रसारित होने वाले समाचारों को गांव के लोग एक साथ इकट्ठा होकर चाव से सुना करते थे। रेडियो पर फरमाइशी गीतों का प्रोगाम भी काफी पसंद किया जाता था और लोग कई कार्यक्रम का बेसब्री से इंतजार करते थे।

पुराने समय में शादी में रेडियो गिफ्ट में देने का चलन था। यह बड़ा गिफ्ट होता था और फिर रेडियो के लाइसेंस की भी चिंता रहती थी। खेती-किसानी के कार्य के लिए नंदा जी-भैराजी कार्यक्रम काफी रोचक हुआ करता था। यह ग्रामीण के साथ नगरीय क्षेत्रों के लोगों द्वारा काफी पसंद किया जाता था।

बदलते समय में नई तकनीक के साथ अब मोबाइल फोन में ही एफएम रेडियो चलने लगे हैं। मनपसंद हजारों गीतों की मेमोरी चिप के साथ रेडियो भी बाजार में आ रहे हैं, लेकिन फिर भी आज रेडियो पर गीत संगीत सुनने का अलग ही आनंद है।

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