हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश में केवल कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं, बल्कि अन्य गैसें भी ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें कृषि, उद्योग, मवेशी, परिवहन, व्यर्थ पदार्थ और डीजी सेट जैसे कई बड़े कारण सम्मिलित हैं। मीथेन, ब्लैक कार्बन और अन्य गैसों के उत्सर्जन से हिमाचल प्रदेश की आबोहवा बिगड़ रही है जिसके लिए सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं, अन्य गैसें भी ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेवार हैं। इस बात का खुलासा अमेरिका की संस्था इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट यानि आईजीएसटी की वैज्ञानिक रिपोर्ट में किया गया है।
यह रिपोर्ट मंगलवार को मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू द्वारा राज्य सचिवालय में प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट जारी होने के बाद पर्यावरण विभाग के सचिव ने हिमाचल में इन गैसों के उत्सर्जन को कम करने की रणनीति की जानकारी दी।
यूएस के वाशिंगटन डीसी से आए संस्था के संस्थापक ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को कम करने के लिए एक दशक से भी कम समय में एक अच्छी रणनीति की जानी होगी। हिमाचल प्रदेश में रणनीतिक तरीके से कार्बन डाइऑक्साइड के अलावा इन अन्य गैसों व पदार्थों के उत्सर्जन के प्रभावों को कम किया जा सकता है। पर्यावरण विज्ञान प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग के निदेशक ने कहा कि रिपोर्ट में सुझाव है कि कृषि, बागवानी, उद्योग, परिवहन जैसे क्षेत्रों में पारिस्थितिकी को ठीक करने पर काम करना पड़ेगा। राज्य में बढ़ते जेनरेटर सेट की संख्या को भी कम किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि पशुओं की नस्लों में सुधार और अच्छे चारे से मीथेन के उत्सर्जन को 25 प्रतिशत से अधिक तक कम किया जा सकता है। पुराने वाहनों को स्क्रैप करके और गाड़ियों को ई-वाहनों में बदलने से अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक जैसे मीथेन, ब्लैक कार्बन इत्यादि को वर्ष 2047 तक घटाया जाएगा। कंपोस्टिंग और लैंडफिल मीथेन को विकेंद्रीकृत करके भी उत्सर्जन को 50 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। एलपीजी के इस्तेमाल और क्लीन कुकिंग से ब्लैक कार्बन व अन्य गैर कार्बनिक गैसों को नियंत्रित किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर श्रेणी की वैश्विक समस्या है। इससे राज्य में अप्रत्याशित बादल फटने, बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियरों के सिकुड़ने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। इन घटनाओं को प्राकृतिक चेतावनी समझते हुए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। साल 2023 की आपदा में राज्य में 22,000 से अधिक भवन क्षतिग्रस्त हो गए थे। हिमाचल प्रदेश केवल एक भौगोलिक भू-भाग ही नहीं, बल्कि हिमालय की आत्मा है और यहां के ग्लेशियर, नदियां, वन और पर्वत इसकी विशिष्ट पहचान हैं।
