उत्तर प्रदेश : बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को लेकर उत्तर प्रदेश के सियासी दलों के बीच सक्रियता बढ़ गई है। बसपा, सपा और कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल कार्यक्रम आयोजित कर दलित वोटबैंक को साधने के प्रयासों में लग गए हैं।
बसपा संस्थापक कांशीराम को याद करने के लिए सभी सियासी दलों में होड़ सी मच गई है। यह अनायास नहीं है बल्कि इसके पीछे दलित वोटबैंक की ताकत है जिसकी वजह से बसपा ही नहीं सपा और कांग्रेस भी अपने- अपने तरीके से कांशीराम की जयंती मना रही है। भाजपा भी इस मुद्दे को हाथ से नहीं जाने देना चाहती।
विदित हो कि बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती 15 मार्च को है। उनकी जयंती से पहले ही सभी दल अलग- अलग कार्यक्रम घोषित कर चुके हैं और बसपा इस अवसर पर लखनऊ में जनसभा करेगी। इसके साथ ही अलग- अलग प्रदेशों में कार्यक्रम हो रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने भी सभी जिलों में कांशीराम की जयंती मनाने की घोषणा की है। इसी क्रम में कांग्रेस द्वारा शुक्रवार को जयंती समारोह और दलित संवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कांशीराम को भारत रत्न देने का प्रस्ताव पास किया।
राहुल गांधी का यह कहना है कि यदि आज जवाहर लाल नेहरू होते तो कांशीराम मुख्यमंत्री बनते। उनका यह कथन किसी न किसी रूप में सियासी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। विभिन्न दलों का अचानक कांशीराम के प्रति उमड़े इस प्रेम के पीछे की असली वजह दलितों वोट बैंक है।
दलित वोट बैंक को प्रत्येक दल अपनी तरफ खींचने के प्रयासों में लगा हुआ है। बता दें कि उत्तर प्रदेश में दलित आबादी तकरीबन 21 फीसदी है। प्रदेश की 85 विधानासभा सीटें अनुसूचित जाति यानि दलित के लिए आरक्षित हैं, लेकिन अन्य सीटों पर भी दलित वोट बैंक का खासा निर्णायक महत्व है जोकि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
कांग्रेस पिछड़ा वर्ग विभाग के प्रदेश अध्यक्ष का मानना है कि कांग्रेस ने सदैव दलितों का ध्यान रखा है। अब पार्टी ने कांशीराम के विचारों को आम जनता तक पहुंचाने का संकल्प लिया है। यही वजह है कि लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में खुद राहुल गांधी ने हिस्सा लिया। यहां से शुरू हुआ अभियान पूरे प्रदेशभर में पहुंचेगा और कांशीराम के विचारों को जन- जन तक पहुंचाने का काम किया जाएगा।
समाजवादी छात्रसभा के राष्ट्रीय महासचिव का कहना है कि कांशीराम हमेशा दलित- पिछड़ों के हाथ में सत्ता की ताकत देखना चाहते थे। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अब उसी रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। वह जाति जनगणना कराकर आबादी के अनुपात में हर वर्ग को भागीदारी देने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
कांशीराम ने दलितों को सांसद, विधायक बनाया, जबकि बसपा सिर्फ धनाढ्य लोगों को टिकट देती है। लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बामसेफ कैडर के वंशीधर बौद्ध को विधानसभा भेजकर यह सिद्ध कर किया है कि वह कांशीराम के बताए रास्ते पर ही आगे बढ़ रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कहते हैं कि सियासी दल वोटबैंक के हिसाब से अपना नजरिया बदलते रहते हैं। इन दिनों दलित वोट बैंक बसपा को लेकर संशय की स्थिति में है। यह वोट बैंक डा. भीमराव आंबेडकर के बाद कांशीराम को ही अपना आदर्श मानता रहा है।
यही वजह है कि इस वर्ष कांशीराम की जयंती पर तमाम बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कांग्रेस, बसपा संस्थापक कांशीराम के द्वारा दिए गए नारे को अपनाकर फिर से पुनर्जीवित होकर अपना सियासी वनवास खत्म करने के प्रयासों में जुटी है।
