उत्तर प्रदेश : पांच राज्यों के चुनाव अकेले अपने दम पर लड़ना बहुजन समाज पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी से कुछ क्षेत्रों में सीमित सीटें जीतने की उम्मीद की जा रही है। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच पार्टी को मजबूत रणनीति और संगठनात्मक पकड़ के जरिए अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने की आवश्यकता है।

बहुजन समाज पार्टी पांच राज्यों केरल, तामिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी में जुटी है। बसपा असम और पुडुचेरी को छोड़कर बाकी तीन राज्यों में अपने प्रत्याशी उतारेगी। हालांकि इन राज्यों में अकेले दम पर चुनाव लड़ना उसके लिए चुनौती साबित हो सकता है। बसपा बीते कई महीनों से पश्चिम बंगाल और केरल में अपने संगठन को धार देने में व्यस्त है जबकि तामिलनाडु में बसपा संगठन पूर्व से अधिक मजबूत है।

केरल में नेशनल कोआर्डिनेटर अशोक सिद्धार्थ, जयप्रकाश सिंह समेत कई वरिष्ठ पदाधिकारियों को चुनाव की तैयारियां करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। बसपा ने पिछले साल दिसंबर के महीने में केरल में निकाय चुनाव में कई सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिससे पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा हुआ है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने बीती 22 फरवरी को इन राज्यों के पदाधिकारियों के साथ बैठक कर चुनाव की तैयारियों में जुट जाने का आह्वान किया था, जिसकी रिपोर्ट भी जल्द ही ली जा सकती है।

तामिलनाडु में विगत कुछ वर्षों में बसपा की जड़ें मजबूत हुई हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे के. आर्मस्ट्रांग की हत्या के बाद स्वयं मायावती और आकाश आनंद ने तामिलनाडु जाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी। पार्टी ने इस घटना को लेकर सत्तारूढ़ दल पर जबरदस्त हमला भी बोला था, जिससे क्षेत्र में, खासकर दलितों में पार्टी की पैठ बढ़ी थी। इसके साथ ही बसपा की डॉ. भीमराव अंबेडकर और कांशीराम की नीतियों वाली एकमात्र पार्टी के रूप में पहचान भी स्थापित हुई थी।

पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में मुकाबला चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाले मुकाबले में बसपा बड़ा उलटफेर करने की क्षमता रखती है। पार्टी ने पश्चिम बंगाल में बूथ लेवल तक संगठन को मजबूती प्रदान की है।

हाल ही में बसपा सुप्रीमो मायावती ने राष्ट्रपति के अपमान पर वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमला भी बोला है। बसपा अगर दलितों के साथ मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो जाती है तो इसका नुकसान तृणमूल कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

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