हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश में सेब के बागवान इस समय गंभीर संकट के दौर को झेल रहे हैं। मौसम के बदलते पैटर्न के चलते लंबे समय से बारिश व बर्फबारी नहीं हो रही है। इसकी वजह से बागवानी से जुड़े कई आवश्यक काम पूरे नहीं हो पा रहे हैं, साथ ही सेब के लिए जरूरी चिलिंग आवर्स पूरे नहीं हो पा रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई इलाकों में बीते दो महीनों से सूखे जैसी स्थिति नजर आ रही है। मौसम की बेरुखी से बागवानों और किसानों में आर्थिक नुकसान का भय बना हुआ है।

आमतौर पर राज्य के ऊपरी और मध्य पर्वतीय क्षेत्र में बागों को दिसंबर माह के मध्य तक तक पर्याप्त ठंड और नमी मिल जाती थी, जिससे बागवान अपने खेतों में कटाई-छंटाई और नए पौधरोपण का काम शुरू कर देते थे, लेकिन इस बार नमी की भारी कमी के चलते बागवान इन कार्यों को शुरु नहीं कर पा रहे हैं। सूखी मिट्टी में खाद डालने से लाभ के स्थान पर नुकसान का खतरा ज्यादा रहता है। बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि सेब के लिए तकरीबन 1500 चिलिंग आवर्स आवश्यक होते हैं, लेकिन राज्य के कई क्षेत्रों में यह आंकड़ा अब भी चिंता का सबब बना हुआ है।

मामले के विशेषज्ञ बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बागवानी के पारंपरिक क्षेत्र लगातार दबाव में आ रहे हैं। यदि समय से हालातों में सुधार नहीं हुआ तो सेब उत्पादन के साथ-साथ हजारों बागवान परिवारों की आजीविका पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा। अगर पूर्व की बात करें तो दिसंबर-जनवरी में अच्छी ठंड पड़ने लगती थी जिससे बर्फवारी हो जाती थी और चिलिंग आवर्स पूरे हो जाते थे। इस बार न तो ठंड ही है और न ही नमी। बागवानों को गोबर की खाद डालना भी व्यर्थ लग रहा है, क्योंकि सूखी जमीन में इसका असर नहीं पड़ता। यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले सीजन में सेब की पैदावार पर इसका सीधा असर पड़ेगा। बागवानों का कहना है कि फिलहाल नए पौधरोपण की योजना को टाला जा रहा है। बारिश न होने से रोपण संभव नहीं है जिससे बागवान इस साल बगीचों के विस्तार के लिए नए पौधे मंगवाने की तैयारी भी नहीं कर पाए हैं।

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