उत्तराखंड : उत्तराखंड में मौसम बदलने और सर्दियों की दस्तक के साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक जंगली जानवरों की आबादी वाले क्षेत्रों में आवाजाही ने यहां के निवासियों की चिंता में इजाफा कर दिया है। पहाड़ी जिलों में तो भालू और गुलदार घरों के आंगन तक पहुंच रहे हैं।

राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले में गुलदार लगातार इंसानों पर हमला कर रहे हैं। घरों के आंगन तक में खेल रहे बच्चे सुरक्षित नहीं रह गए हैं।वहीं चमोली जिले में भालुओं का आतंक पशुपालकों के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है। भालू जंगलों से बाहर आकर रिहायशी इलाकों के नजदीक बनी गौशालाओं में घुस कर मवेशियों को मार रहे हैं।

दूसरी ओर हरिद्वार में हाथियों के झुंड एक बार फिर रिहायशी इलाकों, मंदिर परिसरों और शहर से सटे क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं। बीते कुछ दिनों में सामने आई घटनाएं यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि मानव और वन्य जीवों के बीच टकराव अब किसी एक जिले या एक इलाके तक सीमित नहीं रह गया है। पहाड़ से लेकर मैदान तक निरंतर इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं।

पौड़ी गढ़वाल जिले में गुलदार का आतंक काफी लंबे समय से यहां के निवासियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। जिले में शायद ही ऐसा कोई माह रहा हो, जब गुलदार की आवाजाही या हमले की घटना सामने न आई हो। विगत एक वर्ष में पौड़ी जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर के दायरे में मौजूद गांवों में गुलदार के हमले की लगभग 15 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 12 लोग अपनी जान गवां चुके हैं।

जंगली जानवरों द्वारा लगातार की जा रही हमले की घटनाओं ने ग्रामीणों के मन में भय का माहौल उत्पन्न कर दिया है। वर्तमान समय में हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग अपने घरों के आसपास रास्तों और आंगन में भी बच्चों को अकेला छोड़ने से डर रहे हैं। 

दो दिन पूर्व शाम के समय खांड्यूसैंण क्षेत्र के वजली गांव में गुलदार ने घर के आंगन में मौजूद पांच वर्षीय मासूम को अपना निवाला बना लिया था। बालिका घर के आंगन में खेल रही थी, तभी गुलदार ने अचानक घात लगाकर हमला किया और उसे उठाकर झाड़ियों की ओर ले गया। परिजनों और ग्रामीणों ने शोर मचाते हुए बच्ची की तलाश शुरू की जिसके उपरांत उसका शव घर से कुछ ही दूरी पर बरामद हो गया। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।

मासूम बालिका की असमय मृत्यु के पश्चात ग्रामीणों का आक्रोश चरम पर पहुंच गया और स्थानीय विधायक के घटनास्थल पर पहुंचने पर उनके समक्ष विरोध जताया गया। स्थानीय निवासियों ने विधायक का घेराव कर उनसे लगातार हो रहे गुलदार के हमलों और वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए।

ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुए बताया कि क्षेत्र में लंबे समय से गुलदार की गतिविधियां बढ़ी हुई हैं। इसके बावजूद किसी भी प्रकार की कोई स्थाई सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई है। विरोध के दौरान ग्रामीणों ने विधायक के वाहन को चारों ओर से घेर लिया। उस समय हालात ऐसे बन गए कि विधायक को काफी देर तक अपनी गाड़ी के भीतर ही रहना पड़ा।

प्रदर्शन कर रही एक बुजुर्ग महिला वाहन के बोनट पर चढ़ गई और वन मंत्री तथा जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करने लगी। तकरीबन दो घंटे तक क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बनी रही। ग्रामीण देर रात्रि तक वन मंत्री पौड़ी आओ गुलदार-भालू से हमें बचाओ के नारे लोग लगाते रहे।

इसी दौरान पौड़ी जिले के कोटद्वार क्षेत्र से भी एक बच्ची पर गुलदार के हमले की खबर सामने आई है। हालांकि बच्ची की मां ने साहस का परिचय देते हुए बच्ची को गुलदार के चंगुल से छुड़ा लिया।

उत्तराखंड में लगातार घट रही मानव – वन्यजीव संघर्ष और टकराव की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है, कि क्या पहाड़ के गांवों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए किए गए मौजूदा इंतजाम पर्याप्त हैं..

पहाड़ों में गुलदार और भालू के हमलों के मध्य मैदानी जिले हरिद्वार के आबादी क्षेत्र में हाथियों की चहलकदमी भी चिंता का विषय बनी हुई है। राजाजी टाइगर रिजर्व और हरिद्वार वन प्रभाग से सटे क्षेत्रों में यदा – कदा हाथियों का आबादी की ओर आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब तो हाथियों के रिहायशी इलाकों में आ धमकने की घटनाएं रोजाना की बात हो गई है।

तीन दिन पूर्व नवंबर माह की शुरुआत में ही भेल स्टेडियम से आगे सड़क पर हाथी के पहुंचने और गोल चौराहे पर पहुंच कर खड़े होने से लोग दहशतजदा हो गए।

इसके अलावा नवंबर माह में ही लालढांग क्षेत्र में चार हाथियों का झुंड खाकीर बाबा मंदिर परिसर में पहुंच गया। घटना सोमवार रात्रि की है,  जब हाथियों का झुंड लोगों के बीच पहुंच गया। इसके साथ ही हरिद्वार के हरिद्वार – लक्सर मार्ग पर भी एक हाथी गलियों में घूमता हुआ नजर आया।

उत्तराखंड राज्य में मानव और वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा विगत 25 सितंबर को इस समस्या को आपदा के रूप में मान्यता देने और जिला स्तर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण एवं प्रबंधन समितियां गठित करने का फैसला लिया गया।

08 अक्टूबर को वन्यजीव सप्ताह के समापन समारोह में राज्यपाल ने भी इस निर्णय पर अपनी बात रखी थी। राज्यपाल ने कहा था कि प्रभावित परिवारों को समय पर राहत और मुआवजा प्रदान करने के साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के प्रभावी उपाय बनाए जाने चाहिएं।

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