उत्तराखंड : उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र से राजधानी देहरादून की आवाजाही अब पहले की अपेक्षा ज्यादा आसान बनने जा रही है। दोनों शहरों के मध्य रेल कनेक्टिविटी बढ़ने से रामनगर के स्थानीय लोगों के साथ-साथ कॉर्बेट नेशनल पार्क आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु भी इससे लाभान्वित होंगे।

विदित हो कि देहरादून और रामनगर के मध्य सीधी रेल कनेक्टिविटी की मांग लंबे समय से की जा रही थी, जोकि अब शीघ्र ही पूरी होने जा रही है। सांसद अनिल बलूनी के अनुसार, 18 जुलाई से रामनगर से देहरादून के लिए सीधी ट्रेन सेवा का शुभारंभ कर दिया जाएगा। उन्होंने इसे क्षेत्रवासियों के लिए बड़ी सौगात बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर सांसद बलूनी ने कहा कि कॉर्बेट सिटी के रूप में पहचान रखने वाले रामनगर के लोगों के लिए अब देहरादून आना-जाना  अधिक सुविधाजनक हो जाएगा। इससे स्थानीय लोग सरकारी और निजी कार्यों के लिए देहरादून सुगमता से पहुंच जाया करेंगे। स्थानीय लोगों के अलावा उत्तराखंड आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को भी कॉर्बेट नेशनल पार्क तक पहुंचने में सीधी रेल सुविधा का लाभ प्राप्त हो जाएगा।

सांसद ने अवगत कराया कि शुरुआत में इस ट्रेन का संचालन प्रयोग के तौर पर सप्ताह में दो दिन किया जाएगा। यात्रियों की संख्या और प्रतिक्रिया के आधार पर रेलवे तत्पश्चात इसका संचालन सप्ताह में चार  से पांच दिन तक कर सकता है।

इस नई ट्रेन के संचालन को मंजूरी मिलने के पश्चात सांसद ने रामनगर क्षेत्र के नागरिकों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र को लगातार सुविधाओं का लाभ प्राप्त हो रहा है। इससे पूर्व धनगढ़ी पुल को भी आम जनता के आवागमन के लिए समर्पित किया जा चुका है।

उधर, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यानि नेशनल मेडिकल काउंसिल ने रुद्रपुर और पिथौरागढ़ मेडिकल कॉलेज को वर्ष 2026-27 के शैक्षिक सत्र के लिए एमबीबीएस की मान्यता देने से मना कर दिया है। दोनों कॉलेजों द्वारा 100-100 एमबीबीएस सीटों के लिए आवेदन किया गया था। एनएमसी ने फैकल्टी, संसाधनों और निर्माण कार्य में खामियां बताते हुए यह फैसला लिया है और मान्यता रोक दी है।

दोनों मेडिकल कॉलेजों की मान्यता के लिए 2020 से कार्रवाई चल रही थी और अब 15 दिन के अंदर फिर से आवेदन कर अंडरटेकिंग देनी होगी। इसमें कॉलेज प्रशासन द्वारा एनएमसी को यह संतुष्ट करना होगा कि निर्धारित समय में फैकल्टी पूरी कर ली जाएगी और निर्माण कार्य भी पूर्ण कर दिए जाएंगे। उन्हें इस शर्त पर ही मान्यता प्रदान की जा सकती है।

बता दें कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना से जुड़े नियमों को और अधिक कठोर बनाने का प्रस्ताव रखा है। मसौदे के मुताबिक, किसी भी संस्थान को तब तक मंजूरी नहीं दी जाएगी, जब तक अस्पताल, कॉलेज भवन और अन्य आवश्यक सुविधाएं पूरी तरह तैयार न कर ली जाएं। अब अधूरी परियोजनाओं या अस्थायी व्यवस्थाओं के आधार पर आवेदन स्वीकृत नहीं किए जाएंगे।

देश में नए मेडिकल कॉलेज खोलने के नियमों में बड़ा संशोधन होने जा रहा है। अगर राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग यानि एनएमसी का प्रस्ताव लागू हो जाता है तो अब से अधूरे अस्पताल, निर्माणाधीन भवन या अस्थायी व्यवस्था के सहारे किसी नए मेडिकल कॉलेज को मंजूरी प्रदान नहीं की जाएगी।

मेडिकल कॉलेज प्रारंभ करने से पूर्व इमारत, अस्पताल और अन्य सभी आवश्यक सुविधाएं तैयार होना अनिवार्य होगा। इसका सीधा लाभ मेडिकल छात्रों और मरीजों को मिलेगा, क्योंकि उन्हें शुरु से ही बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। एनएमसी द्वारा मेडिकल संस्थानों की स्थापना, नए पाठ्यक्रम, सीट वृद्धि, मूल्यांकन एवं रेटिंग (संशोधन) विनियम -2026 का मसौदा जारी किया गया है।

प्रस्तावित संशोधनों पर आगामी 30 दिनों तक सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं। मौजूदा व्यवस्था में कई बार अस्पताल या मेडिकल कॉलेज का निर्माण पूरा होने से पहले भी आवेदन कर दिए जाते थे। लेकिन प्रस्तावित नियमों के अनुसार, आवेदन करते समय सभी प्रकार का बुनियादी ढांचा व वैधानिक आवश्यकताएं पूर्ण होना अनिवार्य हो जाएगा। अस्पताल और कॉलेज भवन के लिए किसी भी प्रकार की अस्थायी या काम चलाऊ व्यवस्था स्वीकार नहीं की जाएगी और वर्क-इन-प्रोग्रेस परियोजनाओं पर विचार ही नहीं किया जाएगा।

एनएमसी ने आवेदन प्रक्रिया भी पूर्व से अधिक कठोर करने का प्रस्ताव दिया है। अगर किसी मेडिकल कॉलेज का आवेदन जरूरी दस्तावेजों के बिना जमा किया जाता है तो उसे अतिरिक्त मौका दिए बिना तुरंत खारिज किया जा सकेगा। माना जा रहा है कि अब अधूरी तैयारी के साथ आवेदन करने वाले संस्थानों के लिए मंजूरी पाना आसान नहीं रह जाएगा।

नए के अतिरिक्त पूर्व से चल रहे मेडिकल कॉलेजों को भी एक समर्पित कॉर्पस फंड बनाकर रखना होगा। यह फंड सिर्फ मेडिकल कॉलेज के संचालन के लिए होगा। इसकी राशि मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (एमएआरबी) द्वारा तय की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर कॉलेजों को इसका प्रमाण भी प्रस्तुत करना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कॉलेजों के पास वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित न होने पाएं।

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