नई दिल्ली : देशभर में आज साइकिल फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बन चुकी है, और इसकी कीमतें लाखों तक पहुंच गई है। किसी वक्त 10 रुपये में मिलने वाली साइकिल पर लाइसेंस और कर दोनों लगा करते थे।

साइकिल का अविष्कार साल 1817 के लगभग हुआ था पर भारत में साइकिल का आगमन वर्ष 1890 से 1910 के दौरान मुंबई में हुआ था। अपने शुरुआती दिनों में साइकिल विदेशों से आयात की जाती थी। साइकिल एक आश्चर्यजनक परिवहन का साधन था, जिसे लोग बहुत विस्मय से देखते थे।

1942 के आसपास से देश में ही साइकिल का निर्माण प्रारंभ हो गया और फिर धीरे-धीरे कई कंपनियां साइकिल निर्माण कार्य करने लगीं। समय बीतने के साथ इसने देश में सस्ते-सुगम यातायात के साधन के रूप में अपनी अलग पहचान कायम कर ली। आज यह परिवहन का साधन और साथ ही सेहत और फिटनेस का प्रतीक बन चुकी है।

हमारे देश में साल 1930 के करीब मध्य प्रदेश के इंदौर में महारानी रोड पर साइकिल की दुकानें खुलना आरंभ हुईं और धीरे-धीरे यह साइकिल बिक्री का प्रमुख केंद्र बन गया। 1950 से 60 के मध्य इंदौर में 10 रुपये में साइकिल किस्तों पर मिल जाया करती थी। उस समय व्यापारी अपने ग्राहकों को साइकिल की खरीद पर विशेष छूट प्रदान किया करते थे। 

1950 के दशक में उपहार स्वरूप या दहेज में साइकिल देने का प्रचलन शुरू हुआ। उस समय लोग साइकिल के बारे में बहुत अचरज के साथ सुना करते थे। लोग पहली बार साइकिल देखने पर बड़े ही कौतुहल के साथ उसे निहारा करते था। उस समय साइकिल चलाने का लाइसेंस लगा करता था और साइकिल पर वार्षिक कर भी वसूला जाता था। इस कर की घरेलू और व्यावसायिक उपयोग की दरें अलग – अलग निर्धारित थीं। 

1958 में इंदौर के स्थानीय नगर निगम चुनाव में विपक्षी पार्टी द्वारा साइकिल पर लगने वाले कर की समाप्ति का वादा किया गया और इसी मुद्दे पर उसने चुनाव में विजय प्राप्त की। 1957-58 में नगर में साइकिल कर से निगम को 51000 से अधिक रुपए प्राप्त हुए थे। विदित हो कि उस वक्त इंदौर की कपड़ा मिलों के अधिकतर मजदूरों के पास साइकिल हुआ करती थी। साइकिल पर लगने वाले कर और समय – समय निगम की साइकिल कर की जांच से कामगार खिन्न रहते थे। 


उस समय साइकिल एक परिवहन का सस्ता और सुगम साधन था। साइकिल दुकानों से प्रति घंटे की दर से किराए पर भी मिल जाया करती थी। वर्तमान में भी आधुनिक साइकिलें कई केंद्रों पर किराये पर उपलब्ध हैं। पहले दूध की आपूर्ति करने करने वाले दूधिए साइकिल का सर्वाधिक उपयोग करते थे, पर समय के साथ अब वे भी बाइक से दूध की सप्लाई कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण शहरों का विस्तार और दूरियों का बढ़ना है। साइकिल मुख्यत: पर्यावरण हितैषी वाहन है। जब देश में ईंधन संकट गहराता है तो साइकिल पर आने-जाने की बातें चर्चा का विषय बन जाती हैं।

समय बीतने के साथ साइकिल अब स्वास्थ्य और फिटनेस का प्रमुख साधन बन गई है। पुरातन साइकिल तो अब दुर्लभ वस्तु हो गई हैं और उनके स्थान पर गियर और आधुनिक स्टाइल की साइकिल उपलब्ध हैं। साइकिल की दुकानों पर स्वदेशी ब्रांड के अलावा विदेशी ब्रांड की साइकिल भी बहुतायत में उपलब्ध है। साइकिल की कीमतें भी पांच हजार से लेकर दो लाख तक पहुंच चुकी हैं।

पहले अधिकतर साइकिल मैकेनिक की दुकानें फुटपाथ पर सजती थी, पर अब समय के साथ ये दुकानें भी आधुनिक हो गई हैं। पूर्व में फुटपाथ पर साइकिल रिपेयरिंग का कार्य किया जाता था परन्तु अब नई पीढ़ी ने अपने पुश्तैनी व्यापार को दुकान किराये से लेकर स्वयं के पक्के निर्माण में इसे सु-सज्जित तरीके से करना शुरू कर दिया है।

इस बदलाव से आर्थिक लाभ काफी अच्छा होने लगा है। पंचर लगाने की भी अब आधुनिक तकनीक आ गई है। पहले कई दुकानदार सुबह जल्दी दुकान खोल लेते थे और देर रात्रि तक यह कार्य किया करते थे। परंतु अब समय बदलने के साथ व्यवसाय का समय भी बदल गया है।ऐसे ही अब साइकिल के पंचर के बजाय दो पहिया वाहनों के पंचर अधिक पंचर सुधारे जाने लगे हैं।

आज दिनों दिन महंगे होते जा रहे पेट्रोल-डीजल, बिगड़ती जीवनशैली और बढ़ते वायु प्रदूषण ने शहरों में नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे में साइकिल एक ऐसा विकल्प बनकर उभरी है जो सेहत, बचत और पर्यावरण तीनों मोर्चों पर राहत प्रदान करती है। ऐसा माना जाता है कि प्रतिदिन 30 मिनट साइकिलिंग करने से हृदय रोग व मधुमेह का खतरा कम हो जाता है। इसी को देखते हुए आज देश में साइकिल की मांग फिर से बढ़ने लगी है।

आज से पांच दशक पहले साइकिल की बहुत ज्यादा अहमियत हुआ करती थी। लेकिन धीरे- धीरे लोगों ने साइकिल का उपयोग करना बंद कर दिया। लोगों में ब्लड प्रेशर, शुगर जैसी बीमारी होने का एक कारण इसका उपयोग न करना भी माना जाता है। महानगरों में ज्यादातर लोग इन बीमारियों से ग्रस्त हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि घर, बाजार, स्कूल या दफ्तर जैसी 2 से 5 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए साइकिल सबसे बेहतर साधन है। इससे ईंधन की बचत होने के साथ – साथ प्रतिदिन शारीरिक व्यायाम भी हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2018 में 3 जून को विश्व साइकिल दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रस्ताव पारित किया। इसे मनाने का प्रमुख उद्देश्य साइकिल के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। साथ ही स्वास्थ्य और पर्यावरण का संदेश देना भी है। इस दिवस को मनाने का एक और कारण साइकिल को एक टिकाऊ साधन के रूप में इसकी पहचान बनाए रखना है।

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