उत्तराखंड : प्रदेश की राजधानी देहरादून में अव्यवस्थाओं का आलम यह है कि लोगों का जीना दुश्वार होता जा रहा है। दिन ब दिन बिगड़ती जा रही कानून व्यवस्था से थर्राए लोगों को बेवजह की असुविधाओं का भी जबरदस्ती सामना करना पड़ता है। सरकारी विभागों में आपसी तालमेल की कमी और कामों को लेकर बरती जा रही हीलाहवाली का खामियाजा आम जनता भुगतने को मजबूर है।
दो चार दिन में हो जाने वाले कामों में बेवजह की लापरवाही बरती जा रही है। कोई भी दुर्घटना हो जाने के पश्चात कुछ दिन सतर्कता और कार्यवाही का झुनझुना जनता को थमा दिया जाता है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है।
जिम्मेदार अधिकारी वातानुकूलित सरकारी इमारतों में बैठकर अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं और मासूम जनता कड़ी धूप में अपनी जिंदगी बचाने की जद्दोजहद में जुटी है। आधी रात के बाद तक बार खुले रहते हैं, संकरी सड़कों पर अंधाधुंध रफ्तार से भागती बाइक और कारें लोगों को कुचलने पर आमादा हैं। हर तरफ अनियंत्रित ट्रैफिक की वजह से अराजकता जैसा माहौल है पर जिम्मेदार आंखे मूंद कर बैठे हैं। कुछ बुरा घटित हो जाने पर दो – चार दिन रात की चेकिंग बढ़ा दी जाती है परंतु दिन में उधम मचाते वाहनों को रोकने वाला कोई नहीं है।
समूचे शहर सहित ऐसा ही कुछ नजारा राजधानी का पॉश इलाका माना जाने वाले राजेंद्रनगर – कौलागढ़ रोड़ का भी है। यहां केंद्रीय विद्यालय ओएनजीसी को जाने वाली सड़क गैसपाइप लाइन बिछाने वाली संस्था ने खोद कर छोड़ दी है। सवेरे स्कूल जाते हुए और छुट्टी के समय स्कूल के बच्चों को जान हथेली पर रखकर यहां से गुजरना पड़ता है।
बुधवार दोपहर स्कूल की छुट्टी के समय भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। यहां सुलभ शौचालय के समीप एक बस खड़ी है। पता नहीं किसकी इजाजत से मोड़ के बेहद नजदीक यह बस यहां खड़ी कर दी गई है। दूसरी तरफ सड़क खुदी पड़ी है और मार्ग बेहद संकरा हो गया है, परन्तु किसी जिम्मेदार को इसकी परवाह नहीं है। स्कूल के बच्चे, अभिभावक, टीचर व अन्य स्टाफ सहित ओएनजीसी कॉलोनी में रहने वाले लोग इस बेमतलब की लापरवाही से त्रस्त हैं, लेकिन कोई भी इसका संज्ञान लेने वाला नहीं है। बामुश्किल उस सड़क के मोड़ से गुजरने वाले बच्चे बेमतलब की परेशानी झेल रहे हैं।
कई मर्तबा स्कूल की छुट्टी के समय क्रेन और ट्रक जैसे भारी वाहन स्कूल की सड़क पर चलते नजर आते हैं। उन्हें ऐसे संवेदनशील समय पर इस रोड़ पर चलने की इजाजत कहां से और कैसे मिल जाती है इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
अखबार और अन्य माध्यमों से खबरें छपती हैं, सामने आती हैं परंतु उन्हें पढ़कर, देखकर कार्यवाही करने की जहमत कोई नहीं उठाता। जिम्मेदारों के पास जनता की जान और सलामती से जुड़ी जिम्मेदारी के अलावा और ज्यादा जरूरी अन्य दूसरी जरूरी फाइलें और कार्य हैं, जिनको वो खास तवज्जो दे रहे हैं। आम जनता तो यह सब झेलने की आदी हो चुकी है, और झेल ही रही है। उत्तराखंड की राजधानी का हाल ऐसा जान पड़ता है मानो इतने बड़े शहर में किसी एक इंसान का जीना क्या और मरना क्या, हंसना क्या और रोना क्या।
