उत्तराखंड : उत्तराखंड राज्य में दावानल की घटनाएं लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। वनाग्नि नियंत्रण के लिए संसाधनों को बढ़ाने के तमाम दावों के बावजूद जंगल की आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इससे पौड़ी जिला भी अछूता नहीं है। वर्तमान में बीते दो वर्षों से राज्य में दूसरे नंबर पर सबसे अधिक वनाग्नि की घटनाएं इसी जिले में रिपोर्ट की जा रही हैं।

पौड़ी जनपद में दो वन प्रभाग हैं, जिनमें सिविल सोयम पौड़ी वन प्रभाग भी है। कर्मचारियों के मामले में इस डिवीजन की हालत गढ़वाल प्रभाग जैसी ही है। यहां पर रेंजर और वन आरक्षी के पद रिक्त हैं। तीन रेंज में तो वाहन तक उपलब्ध नहीं हैं। प्रदेश में दूसरा सबसे अधिक वनाग्नि से प्रभावित होने वाला जिला पौड़ी गढ़वाल है। विगत तीन वर्षों में यहां तकरीबन सवा तीन सौ घटनाएं घटित हुईं हैं जिनसे सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल को नुकसान पहुंचा है।

पौड़ी जिले में वर्ष 2023 से 2025 तक वनाग्नि के आंकड़ों पर नजर डालने से ज्ञात होता है कि वर्ष 2023 में प्रदेश में पौड़ी जिला तीसरे नंबर पर था, जहां सबसे अधिक वनाग्नि की घटना हुईं। 2024 और 2025 में यह दूसरे नंबर पर रहा है। विगत तीन वर्ष में तीन सौ से अधिक घटनाएं हुईं जिसमें 430 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल में जैव विविधता की हानि हुई है।

वनाग्नि की दृष्टि से सिविल सोयम पौड़ी, गढ़वाल वन प्रभाग पौड़ी और नागदेव रेंज सबसे अधिक संवेदनशील इलाके हैं। इस साल भी 15 फरवरी से फायर सीजन प्रारंभ हुआ है, जिसके बाद से सिविल सोयम प्रभाग में 18 घटनाओं में करीब 12 हेक्टेयर और गढ़वाल वन प्रभाग में 9 घटनाओं में 20 हेक्टेयर जंगल को नुकसान पहुंच चुका है। यहां पर अप्रैल के महीने में तुलनात्मक तौर पर ज्यादा घटनाएं हुईं।

वन विभाग में प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी से लेकर 15 जून तक फायर सीजन होता है। उससे पहले जंगल में फायर लाइन की सफाई और कंट्रोल बर्निंग की जाती है। जिला फॉरेस्ट फायर प्लान बनाने से लेकर अन्य विभागों के साथ तालमेल बैठकर कार्य करने की बात होती है।

हाल के वर्षों में मॉडल क्रू स्टेशन बनाने, लीफ ब्लोअर देने सहित कई अन्य कदम उठाए गए हैं। परंतु हालत यह है कि सिविल सोयम वन प्रभाग की छह रेंज में रेंजर की जगह डिप्टी रेंजर की ही तैनाती है। वन आरक्षी के 26 पद रिक्त चल रहे हैं। तीन रेंज में तो वाहन तक उपलब्ध नहीं हैं और फायर सीजन में किराए पर वाहन लिया जाता है।

वनाग्नि का एक बड़ा कारण चीड़ की पत्ती पिरुल भी है। पिरुल को एकत्र करने और भुगतान की योजना प्रारंभ की गई है। परंतु वास्तविक हालत यह है कि कमेड़ा गांव के नजदीक जंगल पिरुल से भरा हुआ है। यहां पर पानी संग्रह के लिए एक संरचना बनाई गई है, उसमें भी पिरुल भरा हुआ था

वन संरक्षक के अनुसार, प्रभाग में एक बड़े हिस्से में चीड़ का जंगल है। इसके अतिरिक्त पानी कम होने से शुष्कता भी ज्यादा रहती है जिससे आग का खतरा बढ़ जाता है। साल 2024 में तो आग बुझाने के लिए हेलिकाप्टर की मदद लेनी पड़ी थी।

इसके साथ ही वन महकमा जंगल की आग की एक वजह मानव जनित भी मानता है। कई बार इरादतन कुछ लोग आग लगा देते हैं या असावधानी के चलते आग लग जाती है। कई बार खेतों को साफ करने के दौरान भी आग लगाई जाती है, जो कि वहां से जंगल तक पहुंच जाती है। इस तरह इन घटनाओं में कुछ कारण मानवजनित भी हैं।

वन संरक्षक गढ़वाल वृत्त के मुताबिक वनाग्नि नियंत्रण के लिए कई प्रयास किए गए हैं। इसमें लीसा विदोहन करने वाले ठेकेदारों को जंगल में पिरुल को स्वयं सहायता समूह, स्थानीय लोगों के माध्यम से एकत्र कराने पर दो सौ रुपये प्रति क्विंटल भुगतान किया जाएगा।

इस पिरुल का इस्तेमाल चैक डैम बनाने में किया जाएगा। पिरुल से ब्रिकेट बनाने को दो यूनिट स्थापित किए जा चुके हैं। वन कर्मियों को फायर सूट दिया गया है तथा साथ ही प्रभाग स्तर पर अन्य संसाधनों को भी जुटाया गया है। प्रभाग में 100 फायर वाचर तैनात किए गए हैं।लगातार प्रयास किए जा रहे हैं जिनसे काफी सहायता मिली है।

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