उत्तराखंड : उत्तराखंड के नैनीताल में 27 एकड़ में फैला ऐतिहासिक रैमजे अस्पताल पूरी तरह उजाड़ पड़ा हुआ है। सभी वार्ड, ओटी और कार्यालयों में ताले लटके हैं और बिस्तर सड़ चुके हैं। क्षेत्रीय सांसद ने जब अचानक इस अस्पताल का निरीक्षण किया तो वहां का हाल देखकर वह हैरान रह गए।
नैनीताल शहर के बीचों-बीच स्थित 27 एकड़ के विशाल परिसर, दर्जनों चिकित्सक व कर्मचारी आवास, मेस, लाउंड्री सहित तमाम सुविधाओं से युक्त विशाल और ऐतिहासिक रैमजे यानि जीबी पंत अस्पताल अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। इसके प्रत्येक वार्ड, ऑपरेशन थिएटर तथा कार्यालय पर ताले लटके हैं और यहां किसी भी प्रकार के इलाज की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है।
यहां के सड़ चुके बिस्तरों पर यदि स्वस्थ इंसान लेट जाए तो वह भी बीमार पड़ जाएगा। स्टाफ के नाम पर पांच नर्सिंग स्टाफ, दो फार्मासिस्ट और एक चिकित्सक तैनात हैं। चिकित्सक पीजी डिग्री के लिए लंबी छुट्टी पर गए हैं और बाकी के स्टाफ का कोई अता पता नहीं है। अस्पताल के खिड़की, दरवाजे और लकड़ी का फर्श गलकर सड़ रहे हैं। वर्तमान में इस अस्पताल का इस्तेमाल कभी-कभार केवल फिल्मों या वेबसीरीज की शूटिंग के लिए किया जाता है।
शुक्रवार को क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट अचानक इस अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे तो वह यहां का हाल देख वह दंग रह गए। वहां कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था, सिर्फ एक नर्स मौजूद थी जिसने बताया कि यहां इलाज की व्यवस्था, मरीज, डॉक्टर कुछ नहीं हैं। इस अस्पताल का इस्तेमाल सिर्फ फिल्मों की शूटिंग के लिए होता है।
सांसद ने प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को फोन कर अस्पताल की दशा सुधारने के लिए तत्काल एक समिति गठित करने का अनुरोध कर डीजी हेल्थ को प्रस्ताव बनाने के निर्देश दिए। सांसद ने कहा कि अस्पताल के जीर्णोद्धार के लिए केंद्र सरकार से भी मदद लेने का प्रयास किया जाएगा।
ब्रिटिश काल में 1893 में स्थापित किया गया रैमजे अस्पताल, जिसे बाद में जीबी पंत अस्पताल नाम दिया गया, किसी समय मात्र कुमाऊं मंडल ही नहीं बल्कि पूरे देश के मरीजों के लिए भरोसे का केंद्र था। आज अस्पताल सरकारी उपेक्षा, संसाधनों की कमी, स्वास्थ्य तंत्र की असफलताओं का प्रतीक बन कर रह गया है।
ब्रिटिश शासनकाल के दशकों बाद तक भी रैमजे अस्पताल सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता था। उस दौर में सीमित चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद अस्पताल अनुभवी सर्जनों, चिकित्सकों के कारण विख्यात था। कुमाऊं, गढ़वाल के साथ देश के अन्य हिस्सों से भी लोग यहां उपचार के लिए आते थे। यहां के कई नामी सर्जनों की ख्याति इतनी थी कि मरीज विशेष रूप से उन्हीं से ऑपरेशन कराने इस अस्पताल में भर्ती होते थे।
अस्पताल की डायलिसिस सेवा हंस फाउंडेशन के भरोसे चल रही है।
अस्पताल के एक कमरे में मरीजों के लिए डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जिसका संचालन, उपकरण और चिकित्सक तक हंस फाउंडेशन ने उपलब्ध कराए हैं।
एसीएमओ के अनुसार, अस्पताल में तैनात एकमात्र चिकित्सक पीजी डिग्री के लिए गए हुए हैं। अस्पताल के सुधार के लिए अनेक प्रस्ताव बनाए गए हैं, परंतु सब अभी लंबित हैं।
उधर, नैनीताल जिले के ही रामनगर स्थित संयुक्त चिकित्सालय में सीटी स्कैन सहित अन्य जरूरी मशीनें एक साल से अधिक समय से खराब पड़ी हैं। पीपीपी मोड के संचालकों की ओर से इन मशीनों को ठीक कर अस्पताल को सौंपा जाना था लेकिन उन्होंने अभी तक इसकी सुध नहीं ली है। मरीजों को जांच कराने के लिए मजबूरन प्राइवेट अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।
विदित हो कि वर्ष 2020 में रामनगर के रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय को सरकार ने पीपीपी मोड पर दे दिया था। अस्पताल के संचालन हेतु तकरीबन दो करोड़ रुपए की धनराशि प्रत्येक माह पीपीपी मोड के लिए अदा की जाती थी।
01 अप्रैल 2025 को सरकार ने अस्पताल को पीपीपी मोड से हटाकर स्वास्थ्य विभाग के अधीन कर दिया। इस दौरान पीपीपी मोड संचालकों को अस्पताल में संचालित होने वाली मशीनों को ठीक कराकर अस्पताल के सुपुर्द किया जाना था। परंतु एक वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के पश्चात भी संचालकों की ओर से सीटी स्कैन, वेंटिलेटर, डीआर समेत अन्य मशीनों को अभी तक ठीक नहीं कराया जा सका है।
प्रभारी सीएमएस, रामनगर के मुताबिक, अस्पताल की सीटी स्कैन सहित बाकी की मशीनों को अब तक पीपीपी मोड संचालकों की ओर से ठीक नहीं कराया गया है। इसे लेकर डीजी हेल्थ को पत्र प्रेषित किया गया है। मशीने ठीक होते ही मरीजों की जांच प्रारंभ कर दी जाएगी।
