उत्तराखंड : उत्तराखंड में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय तप रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेजी से बढ़ती मानवीय गतिविधियां और  असंतुलित विकास हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।

ग्लोबल वार्मिंग, असंतुलित विकास और मानवीय हस्तक्षेप का असर अब मध्य और उच्च हिमालय क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए ताजा अध्ययन में चेतावनी जारी की गई है कि यदि मौजूदा हालात जारी रहे तो इस सदी के अंत तक हिमालय का औसत तापमान 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के सम्मुख गंभीर खतरा उत्पन्न कर देगा।

पौड़ी स्थित जीबी पंत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान में हिमालय में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए टिकाऊ बुनियादी ढांचा विषय पर आयोजित कार्यशाला में पहुंचे वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष समक्ष रखे। विशेषज्ञों के मुताबिक तेजी से बढ़ती मानवीय गतिविधियां और असंतुलित विकास योजनाएं हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण पर बेहद बुरा असर डाल रही हैं।

वैज्ञानिकों ने साझा किया कि बीते कुछ दशकों में हिमालय क्षेत्र में औसत तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा गति से बढ़ा है। अध्ययनों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि से बर्फबारी, ग्लेशियर और जलचक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं और अंधाधुंध कटान के चलते सघन वन क्षेत्र लगातार सिमटते जा रहे हैं। तेजी से कंक्रीट में परिवर्तित होते जा रहे गांव व शहरों से हीट आइलैंड इफेक्ट को बढ़ावा मिल रहा है।

तापमान में बढ़ोतरी का असर बर्फबारी के पैटर्न पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। पहले जहां 2000 मीटर की ऊंचाई तक बर्फ पड़ती थी, वहीं अब यह सीमा बढ़कर लगभग 2500 मीटर तक सरक गई है। इसका सीधा असर प्राकृतिक जलस्रोतों और पारंपरिक जलधाराओं पर भी पड़ रहा है। साथ ही सेब, नाशपाती और दूसरी शीतकालीन फसलों के उत्पादन पर भी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहा है।

जलवायु परिवर्तन की वजह से पश्चिमी विक्षोभ का समय-चक्र भी परिवर्तित हो गया है। एक दशक पहले तक जहां यह दिसंबर से फरवरी के बीच सक्रिय रहता था, अब खिसक कर फरवरी से अप्रैल तक पहुंचने लगा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देर से होने वाली बर्फबारी ग्लेशियरों के पुनर्भरण में उतनी प्रभावी नहीं हो पाती जिससे जलस्रोतों के स्तर में सुधार नहीं हो पाता।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि विगत 100 वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि हिमालय लगातार अपने बड़े ग्लेशियरों को खो रहा है। पिछले पांच वर्षों के अध्ययन में पाया गया है कि तापमान में हो रही वृद्धि की वजह से कई ग्लेशियर औसतन करीब 20 मीटर तक पीछे खिसक चुके हैं।

हिमालय में तापमान वृद्धि और अनियंत्रित मानवीय गतिविधियों के चलते ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है, नहीं तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम सामने आएंगे और आने भी लगे हैं।

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