नई दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल, एप्पल और भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम को निर्देशित किया है कि वे ऐसे एप्स के प्रसार को तुरंत रोका जाए और 2021 के आईटी नियमों का पालन किया जाए। साथ ही, जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई तक, की गई कार्रवाई की रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए।
बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने गूगल और एप्पल को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि वे अपने प्ले स्टोर और एप स्टोर पर अश्लील, वेश्यावृत्ति तथा दूसरी आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली मोबाइल एप्लिकेशन्स के खिलाफ तुरंत और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करें। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पूरी पीढ़ी को बर्बाद होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने आईटी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 का हवाला देते हुए कहा कि गूगल और एप्पल जैसे मध्यस्थों की जिम्मेदारी केवल शिकायत मिलने पर ही नहीं, बल्कि ऐसे ऐप्स को अपलोड होने के समय ही उचित जांच पड़ताल करना है।
पीठ ने कहा कि इन एप्स की व्यापक पहुंच को देखते हुए मध्यस्थों को आईटी नियम 2021 के तहत महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। उन्हें शिकायत पर कार्रवाई करने के साथ ही अपलोड के समय भी सतर्क रहना चाहिए। अदालत का यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर पर कई ऐसे ऐप उपलब्ध हैं जो पोर्नोग्राफिक सामग्री, वेश्यावृत्ति अनैतिक तस्करी, नशीले पदार्थों के दुरुपयोग, अवैध हथियारों की तस्करी और संगठित अपराध को बढ़ावा देने का कार्य करते हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि ये ऐप्स ऐसे आपराधिक कार्यों के जरिए करोड़ों डॉलर की कमाई कर रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर ने याचिका का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सरकार अकेले दुनिया भर में सब कुछ ब्लॉक नहीं कर सकती, इसलिए मध्यस्थों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
इस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल और एपल को अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध अश्लील कंटेंट वाले एप्स पर तुरंत लगाम लगाने के कठोर निर्देश दिए। कोर्ट ने गहन चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर देश की पूरी युवा पीढ़ी को बर्बाद होने की छूट नहीं दी जा सकती। टेक कंपनियों को अब केवल शिकायतों का इंतजार करने के बजाय, एप अपलोड होते ही ऐसे कंटेंट को रोकने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे देश की पूरी एक पीढ़ी को इस तरह के कंटेंट की वजह से बर्बाद होते हुए नहीं देखा जा सकता। बेंच ने आगे विस्तार देते हुए कहा कि हालांकि वे संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा सम्मान करते हैं, परंतु इस आजादी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि किसी को भी अश्लील सामग्री फैलाने की खुली छूट प्रदान कर दी जाए।
इतना ही नहीं, इन एप्स का गलत इस्तेमाल ब्लैकमेलिंग और हनी-ट्रैप जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम देने के लिए भी किया जा रहा है। वकील ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की, कि इनमें से अधिकतर एप्स विदेशी हैं, जो भारतीय कानूनों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए भारत के जरिए करोड़ों रुपये की कमाई का लाभ उठा रहे हैं।
