हिमाचल प्रदेश : हिमाचल प्रदेश रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी यानि रेरा ने हिमुडा के धर्मपुर हाउसिंग प्रोजेक्ट का पंजीकरण रद्द कर दिया है। साथ ही प्राधिकरण ने सभी आवंटियों को जमा राशि 10.8 प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने का आदेश जारी किया है।
आदेश के मुताबिक, हिमुडा को 60 दिनों के भीतर सभी आवंटियों को ब्याज सहित रिफंड देना होगा और 28 अप्रैल 2026 से प्रभावी 10.8 प्रतिशत ब्याज दर लागू रहेगी। यदि भविष्य में हिमुडा इस क्षेत्र में नई योजना लाता है, तो मौजूदा आवंटियों को उस योजना में प्राथमिकता दी जा सकती है। साथ ही हिमुडा को 30 दिन के अंदर सभी आवंटियों को परियोजना के पंजीकरण रद्द होने की सूचना भी प्रदान करनी होगी।
मामला एक शिकायतकर्ता की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। उनके द्वारा 31 अगस्त 2022 को धर्मपुर हाउसिंग प्रोजेक्ट में प्लॉट नंबर 33 बुक कराकर 4.75 लाख रुपये जमा कराए गए थे। लेकिन अपनी शिकायत में उन्होंने परियोजना में जरूरत से ज्यादा देरी और निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। हिमुडा ने अपने पक्ष में कोविड-19 महामारी, भूस्खलन, ठेकेदार की लंबी बीमारी, पानी की कमी और कानूनी विवादों को विलंब की प्रमुख वजह बताया।
प्राधिकरण की ओर से बताया गया कि वर्ष 2022 से 2024 के मध्य भारी बारिश के कारण परियोजना स्थल पर भूस्खलन हुआ। साथ ही जल शक्ति विभाग की पेयजल योजना भी स्थानीय मुकदमेबाजी की वजह से प्रभावित रही। रेरा ने माना कि बुनियादी ढांचे की कमी, प्राकृतिक आपदाओं और कानूनी अड़चनों की वजह से यह परियोजना व्यावहारिक नहीं रह गई है। इसके पश्चात परियोजना का पंजीकरण रद्द करने का फैसला लिया गया।
वहीं, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में सरकारी आवासों के आवंटन की वर्तमान व्यवस्था पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सामान्य प्रशासन विभाग यानि जीएडी के एकाधिकार और आवंटन की अपारदर्शी प्रणाली के चलते आज किसी अधिकारी या कर्मचारी को सरकारी मकान मिलना, लॉटरी के हाथ लगने के समान हो गया है। अदालत ने निर्देश दिया कि व्यवस्था में पारदर्शिता बरतने के लिए सदैव के लिए एक ही सिंगल वेटिंग लिस्ट वरिष्ठता सूची होनी चाहिए।
जिन कर्मचारियों को मकान आवंटित हो जाएं, उनका नाम सूची से हटा दिया जाए और नए आवेदकों का नाम नीचे जोड़ दिया जाए, लेकिन आवेदन की तिथि के अनुसार वरिष्ठता बरकरार रखी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि प्रत्येक वर्ष सरकारी आवास के लिए नए सिरे से आवेदन करने का मौजूदा मजाक समाप्त किया जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त अदालत ने कहा कि एचपीपीएससी जैसे स्वतंत्र संस्थानों को कुछ समर्पित आवास आवंटित किए जाने चाहिए, जिससे नियोक्ता विभाग अपनी जरूरत के हिसाब से स्वयं अपने कर्मचारियों को आवास उपलब्ध करा सके। मामले में अगली सुनवाई 20 जुलाई निर्धारित की गई है।
सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया है कि कोर्ट की इस गंभीर चिंता से संबंधित उच्च अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा। इसके लिए उन्होंने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। अदालत ने उम्मीद जताई कि अगली बार संबंधित प्राधिकरण कोर्ट के पिछले आदेशों और टिप्पणियों के आलोक में अधिक समझदारी और विवेकपूर्ण जवाब दाखिल करेगा। अदालत द्वारा यह आदेश याचिकाकर्ता बनाम हिमाचल प्रदेश मामले की सुनवाई के दौरान जारी किए गए।
बता दें कि पिछली सुनवाई में अदालत ने राज्य सरकार से पूछा था कि हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के कर्मचारियों के लिए समर्पित आवास क्यों नहीं उपलब्ध कराए जा सकते। अदालत ने प्रश्न किया था कि क्यों इन कर्मचारियों को प्रत्येक बार आवास आवंटन के लिए जीएडी के सामने भीख का कटोरा लेकर जाना पड़ता है। इसके उत्तर में उप-सचिव जीएडी की ओर से अदालत में निर्देश पेश किए गए।
सरकार ने दलील दी थी कि लोक सेवा आयोग के लिए कोई अलग से आवास पूल नहीं है और मकानों की भारी कमी है। इस कारण किसी भी कर्मचारी को अधिकार के तौर पर आवास का दावा करने का हक नहीं है। आवंटन सिर्फ 1994 के नियमों के तहत उपलब्ध मकानों के आधार पर ही किया जाता है। हाईकोर्ट ने सरकार के इस उत्तर को पूर्ण रूप से नाकाफी बताया और कहा कि इन निर्देशों में ऐसा कुछ भी नया नहीं है, जो अदालत को पहले से ज्ञात न हो।
प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को वर्ष 2011 की एक अधिसूचना के तहत स्टोन क्रशर से टैक्स की वसूली या संग्रह करने से अंतरिम रूप से रोक दिया है। अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए निर्देशित किया है।
यह आदेश स्टोन क्रशर के मालिक की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत के समक्ष एक पुराने मामले के आदेश का हवाला भी दिया।
उन्होंने तर्क प्रस्तुत किया कि हिमाचल प्रदेश टैक्सेशन संशोधित एक्ट, 2012 के लागू होने के पश्चात 21 जून 2011 की पुरानी अधिसूचना स्वतः निरस्त मानी जाएगी। संशोधित कानून के अनुरूप इस तरह का टैक्स वसूलने की अधिसूचना जारी करने का अधिकार केवल आबकारी एवं कराधान आयुक्त के पास है।
क्योंकि उक्त प्राधिकारी की ओर से ऐसी कोई नई अधिसूचना जारी नहीं की गई है, इसलिए वर्तमान टैक्स वसूली पूरी तरह से बिना अधिकार क्षेत्र के और गैरकानूनी हो गई है। खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को देखते हुए कहा कि राज्य सरकार का जवाब आने तक याचिकाकर्ता से इस अधिसूचना के तहत कोई वसूली न की जाए। मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई निर्धारित की गई।
