नई दिल्ली : दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने स्पष्ट किया है कि तय समय सीमा में यमुना की स्थिति में सुधार आना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर विभिन्न विभागों और एजेंसियों की जिम्मेदारियां अलग-अलग तय की जाएंगी, जिससे किसी भी कार्य के लिए जवाबदेही स्पष्ट हो जाए।
यमुना की सफाई और दिल्ली के प्रदूषण स्तर में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले समय में राजधानी में सरकारी कामकाज का मौजूदा ढांचा बदला जा सकता है। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने इस बात के साफ संकेत दिए हैं।
उपराज्यपाल के मुताबिक, फिलहाल उनकी प्राथमिकता यही है कि दिल्ली सरकार के विभाग, डीडीए और एमसीडी जैसी एजेंसियां आपसी समन्वय के साथ और ईमानदारी से काम करें। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से यमुना सफाई और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता सुधार के लिए निर्धारित की गई नई समयसीमा तक इंतजार किया जाएगा।
लेकिन यदि इसके बाद भी यमुना की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं आता है, तो फिर व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा। एलजी के अनुसार, नालों की सफाई की जिम्मेदारी एक एजेंसी को, सड़कों के निर्माण की जिम्मेदारी दूसरी एजेंसी को और अन्य कामों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय की जा सकती है।
विदित हो कि राजधानी दिल्ली में लंबे समय से सड़क, सीवर, नालों और जलभराव जैसे मुद्दों पर अलग-अलग विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। एलजी ने इसी समस्या का समाधान करने के लिए जिम्मेदारी के स्पष्ट बंटवारे के बारे में बात की।
उन्होंने कहा कि अभी व्यवस्था को बदलने के स्थान पर सभी विभागों को तालमेल से मिलकर काम करने का अवसर प्रदान किया जा रहा है। दिल्ली में कई अधिकारी और कर्मचारी अच्छा कार्य कर रहे हैं तथा उनके साथ मिलकर बेहतर परिणाम हासिल करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
एलजी ने कहा कि अगर संकल्प के साथ और गंभीरता से प्रयास किए जाएं तो यमुना की पवित्रता वापस लाई जा सकती है। उन्होंने दुनिया के उन शहरों का उदाहरण दिया जहां नदियों को प्रदूषण से मुक्त किया जा चुका है। उन्होंने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता और कार्यप्रणाली में सुधार को यमुना सफाई की सबसे अहम कड़ी बताया।
एलजी ने हौजरानी अग्निकांड का उदाहरण देते हुए बताया कि इस घटना के बाद स्थनीय जिलाधिकारी की अध्यक्षता में संबंधित विभागों के अधिकारियों की हाईलेवल कमेटी बनाई गई है। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किस विभाग की क्या जिम्मेदारी थी। किस स्तर पर लापरवाही बरती गई और किन अधिकारियों की जवाबदेही बनती है। इसके पश्चात आगे की व्यवस्था तय की जाएगी।
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान एलजी ने दिल्ली की सड़कों, ट्रैफिक व्यवस्था, प्रदूषण, अस्पतालों और स्कूलों के नजदीक अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि पुलिस और प्रशासन को एआई तथा डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने अधिकारियों को मौके पर जाकर समस्याओं को समझने और आम लोगों के मध्य रहकर कार्य करने की जरूरत पर बल दिया।
उधर दूसरी ओर गाजियाबाद से मेरठ तक जा रहे रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम कॉरिडोर के किनारे ग्रीन फील्ड सिटी बसाई जा सकती है। कुछ दिन पूर्व दिल्ली में एनसीआर प्लानिंग बोर्ड की बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें क्षेत्रीय योजना-2041 के मसौदे पर विस्तार से चर्चा की गई।
बोर्ड बैठक में तीनों राज्यों दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में आरआरटीएस कॉरिडोर के किनारे ग्रीन फील्ड सिटी विकसित करने के प्रस्ताव पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ। राज्यों से संभावित भूमि चिह्नित कर प्रस्ताव भेजने के लिए कहा गया है। अगले दो महीने में होने वाली बैठक में ड्राफ्ट के अंतिम रूप लेने की संभावना जताई जा रही है। एनसीआर में तेजी से बढ़ती आबादी और अनियोजित शहरीकरण के दबाव को कम करने के लिए ग्रीन फील्ड सिटी विकसित करने की योजना बनाने पर विचार किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद और मेरठ दोनों जिलों में आरआरटीएस कॉरिडोर मौजूद है। ऐसे में ग्रीन फील्ड सिटी इनमें से किसी एक जिले में विकसित की जा सकती है। ग्रीन फील्ड सिटी का उद्देश्य पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ शहरी विकास सुनिश्चित करना है।
यहां सड़क, सीवर, पेयजल, बिजली, पार्क, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक क्षेत्र जैसी सुविधाएं पहले से तय योजना के अनुरूप विकसित की जाएंगी। इनमें सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देने के साथ अधिक हरित क्षेत्र, वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा और स्मार्ट सिटी जैसी सुविधाओं को शामिल किया जाएगा।
