हिमाचल प्रदेश : हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शारीरिक शिक्षा प्रवक्ताओं यानि डीपीई की नियुक्ति और वरिष्ठता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के बाहर जाकर किसी भी नियुक्ति का आदेश नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि आरएंडपी नियमों में डीपीई की बैचवाइज भर्ती का कोई प्रावधान नहीं है। याचिकाओं में मांग की गई थी कि उन्हें उचित तिथि से सीधी भर्ती के माध्यम से रोजगार कार्यालयों से उनके नाम लेकर नियुक्ति प्रदान की जाए। इसके साथ साथ उन्हें सभी परिणामी लाभ भी प्रदान किए जाएं, जैसे कनिष्ठों को प्रदान किए गए हैं।

यह कहा गया कि याचिकाकर्ता वरिष्ठ होने के बावजूद ऐसी नियुक्तियों से वंचित रह गए हैं। मुख्य शिकायत थी कि याचिकाकर्ता भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुसार शारीरिक शिक्षा डिप्लोमा धारक के पद के लिए पात्र थे। इसके बावजूद प्रतिवादियों ने आरएंडपी नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना रोजगार कार्यालयों के माध्यम से उक्त पदों को भर दिया।

डीपीई के करीब सवा दो सौ से अधिक पद रिक्त पड़े थे और प्रतिवादियों ने वर्ष 2000 के बाद से याचिकाकर्ताओं से कनिष्ठ व्यक्तियों को डीपीई के पदों पर नियुक्त कर दिया था। न्यायाधीश ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के उपरांत पाया कि आरएंडपी नियमों में डीपीई की बैचवाइज भर्ती का कोई प्रावधान नहीं है।

विदित हो कि सीधी भर्ती के 382 पदों के विरुद्ध 645 डीपीई की नियुक्ति की जा चुकी है और सीधी भर्ती का कोटा पहले ही निर्धारित कोटे से ज्यादा भरा जा चुका है। 2003 में पैरा-शिक्षक नीति के तहत 89 डीपीई नियुक्त किए गए थे। इन पैरा-शिक्षकों की सेवाओं को सरकारी मंजूरी के अनुसार विभाग ने वर्ष 2014 में नियमित कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क देते हुए कहा था कि उन्हें उनके बैच की वरिष्ठता के आधार पर नियुक्ति मिलनी चाहिए।

हालांकि, अदालत ने देरी व उचित समयसीमा के भीतर दायर न करने और चयनित उम्मीदवारों को पक्षकार न बनाने पर याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 2005 से 2011 के बीच हुई नियुक्तियों को 2014 में चुनौती दी। जिन जूनियर की नियुक्ति को अवैध बताया गया, उन्हें इस मामले में पार्टी नहीं बनाया गया। कानूनन किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध उसकी अनुपस्थिति में आदेश पारित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग कि थी कि उन्हें पीटीए या पैरा-टीचर नियुक्तियां नीति की तरह रियायत दी जाए।

हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्तें अधिनियम 2024 को असंवैधानिक करार देने के बाद महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी जारी कर दिए हैं।

अदालत ने अंजना और अन्य मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से बनाया गया यह कानून कानूनी कसौटी पर टिकने लायक नहीं है। अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा कि वह कर्मचारी जो अनुबंध नीति के तहत नियुक्त हुए थे और बिना किसी ब्रेक के नियमित हुए हैं, उनकी अनुबंध अवधि को पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए अर्हक (पात्रता) सेवा के रूप में गिना जाएगा।

अदालत ने कहा कि अनुबंध अवधि के दौरान की वार्षिक वेतन वृद्धियों को काल्पनिक आधार पर जोड़ा जाएगा, इससे सेवानिवृत्ति के समय अंतिम आहरित वेतन का सही निर्धारण हो सके। हालांकि, अनुबंध अवधि के पिछले एरियर का भुगतान नहीं होगा। जिन कर्मचारियों की नियुक्ति आरएंडपी नियमों के तहत खुली प्रतियोगिता या बैचवाइज आधार पर हुई थी, उन्हें नियमित होने पर वरिष्ठता और वित्तीय लाभ उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तिथि से ही प्रदान किए जाएंगे।

अदालत ने कहा कि जहां नियुक्ति प्रक्रिया नियमित भर्ती के समान नहीं थी, वहां अनुबंध अवधि को वरिष्ठता के लिए नहीं गिना जाएगा, लेकिन पेंशन के लिए इसका इस्तेमाल किया जाएगा। वित्तीय लाभों का दावा करने में विलंब की स्थिति में लाभों का दावा करने की तिथि से तीन वर्ष पूर्व तक सीमित किया जा सकता है, सिवाय उन मामलों के जहां अदालत ने पहले ही पूर्ण लाभ देने का आदेश जारी किया हो।

अदालत ने सक्षम अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे इस फैसले और सांविधानिक जनादेश के अनुरूप तीन महीने के अंदर पात्र कर्मचारियों को लाभ प्रदान करने के लिए आदेश जारी करें।

अदालत का यह महत्वपूर्ण निर्देश उन हजारों कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत की बात है, जिनकी अनुबंध सेवा को सरकार नए कानून के माध्यम से नजरअंदाज करने का प्रयास कर रही थी। अदालत के आदेश से स्पष्ट हो गया है कि न्यायिक फैसलों के माध्यम से मिले लाभों को किसी भी नए अधिनियम की ओर से मनमाने ढंग से वापस नहीं लिया जा सकता।

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