जम्मू कश्मीर : ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान को सबक सिखाने के पश्चात अब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की नदियों में अपने हिस्से का पानी पूरी तरह से इस्तेमाल करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने लघु पनबिजली विकास योजना को मंजूरी प्रदान कर के अपनी नदियों से पाकिस्तान जाने वाले पानी की प्रत्येक बूंद का इस्तेमाल करने का रास्ता तैयार कर लिया है।

इस योजना के तहत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 25 मेगावॉट तक की पनबिजली परियोजना लगाई जा सकेगी और  निवेशकों को सब्सिडी भी दी जाएगी। आवेदन के लिए आधिकारिक पोर्टल इसी सप्ताह खुल जाने की उम्मीद है।

रन ऑफ द रिवर परियोजनाओं में अड़चनों के अस्थायी तौर पर हटने के उपरांत केंद्र सरकार अब छोटी पनबिजली परियोजनाओं को सीमावर्ती जिलों में बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है। यह योजना सीमावर्ती राज्यों विशेषकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के नए अवसर लेकर आई है। यह कदम न सिर्फ स्थानीय बिजली की जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि भारत की रणनीतिक जल-कूटनीति को भी मजबूती प्रदान करेगा।

परियोजनाओं के लिए नई योजना को केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय इसी सप्ताह इसका आधिकारिक पोर्टल लांच करने जा रहा है। इस पोर्टल के माध्यम से निवेशक छोटी पनबिजली परियोजनाओं में आवेदन कर पाएंगे। केंद्र सरकार ने लघु पनबिजली विकास योजना को मंजूरी देकर अपनी नदियों से पाकिस्तान जाने वाले पानी की प्रत्येक बूंद का इस्तेमाल करने का मार्ग तैयार कर दिया है।

इस योजना के तहत 01 से 25 मेगावॉट तक की क्षमता वाली पनबिजली परियोजनाओं को लगाया जा सकेगा। लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि देश में तकरीबन 1500 मेगावॉट की नई लघु जल विद्युत क्षमता विकसित की जाए। इसके लिए देशभर में ऐसी करीब 200 पनबिजली परियोजनाएं तैयार की जाएंगी।

मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा और एलओसी से सटे जिलों में परियोजना लागत का 30 प्रतिशत या प्रति मेगावॉट अधिकतम 3.6 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी प्रदान की जाएगी। अन्य जिलों में यह सहायता 20 प्रतिशत या प्रति मेगावॉट 2.4 करोड़ रुपये तक निर्धारित की गई है।

इस योजना का कुल परिव्यय 2584.60 करोड़ रुपये है तथा इसे वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक के लिए लागू किया जा रहा है। विशेष रुप से कठुआ जिले में बड़े स्तर पर औद्योगिकीकरण के बीच बिजली की बढ़ी हुई मांग और नए उद्योग लगाने के लिए ऊर्जा उपलब्धता के नए रास्ते भी तैयार होंगे।

जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती पुंछ, कठुआ, राजोरी और कुपवाड़ा सरीखे जिलों में लघु पनबिजली विकास योजना से न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलेगी। निर्माण में रोजगार मिलने के साथ – साथ संचालन और रखरखाव में भी ग्रामीण युवाओं को स्थायी अवसर मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

विदित हो कि रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाएं बड़े बांध बनाए बिना ही नदी के पानी के प्राकृतिक प्रवाह का इस्तेमाल करके बिजली उत्पादन करती हैं। इसमें पानी के एक हिस्से को नहरों और पाइप के माध्यम से मोड़कर टरबाइन चलाए जाते हैं। इसके पश्चात पानी को वापिस मुख्यधारा में छोड़ दिया जाता है। जम्मू-कश्मीर में पहले से ही 1312 मेगावॉट की लघु जल विद्युत क्षमता चिह्नित है परंतु इसका उपयोग सीमित है।

नई योजना से अप्रयुक्त क्षमता का दोहन संभव हो जाएगा और सीमावर्ती क्षेत्रों में चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे स्थानीय उद्योगों और स्वरोजगार को तो बढ़ावा मिलेगा ही बल्कि पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता भी घट जाएगी।

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