नई दिल्ली : देशभर में मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब समस्या सिर्फ कम बारिश होना नहीं, बल्कि बारिश का असमान और अनिश्चित तरीके से होना है। लंबे अध्ययन और हालिया मौसम आंकड़ों से ज्ञात होता है कि मौसम की अनिश्चित निरंतरता का असर खेती, जल संसाधनों, शहरी जीवन और पर्यावरण पर बढ़ सकता है।
भारत के सामने चुनौती अब केवल कम या अधिक बारिश की नहीं, बल्कि बदलते मानसून-पैटर्न की है। वर्ष 2026 में देश ने 1901 के बाद का पांचवां सबसे ज्यादा सूखा जून का महीना देखा। कई राज्यों में मानसून करीब दो सप्ताह तक ठहरा रहा, जबकि कुछ क्षेत्रों में कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश ने बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए।
मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के बदलते पैटर्न का संकेत मान रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा बारिश की कमी नहीं बल्कि उसकी अनिश्चितता है। यदि बारिश की यही प्रवृत्ति रही तो भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती कम वर्षा नहीं, बल्कि उसका अनिश्चित और असमान होना होगा। यह परिवर्तन खेती, शहरों और जल सुरक्षा के सम्मुख बड़ा जोखिम बन सकता है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित बीएसआईपी की लगभग 2700 वर्षों के मानसूनी इतिहास पर आधारित अध्ययन ने इस बहस को नया आधार प्रदान कर दिया है। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के निदेशक की निगरानी में वैज्ञानिकों ने मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की प्राचीन झीलों की तलछट में सुरक्षित जीवाश्म परागकणों और वनस्पति अवशेषों का अध्ययन कर पिछले तकरीबन 2700 वर्षों के मानसून, वनस्पति और मानव गतिविधियों का डाटा एकत्रित किया है।
अध्ययन में स्पष्ट बताया गया है कि भारतीय मानसून पूर्व में भी कई बार अपने स्वभाव में बड़े बदलाव ला चुका है। प्रत्येक बदलाव के साथ जंगल, खेती और मानव बसावट का स्वरूप भी बदल गया। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका क्वार्टनरी रिसर्च ने इसे प्रकाशित किया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब कुल बारिश होने से ज्यादा उसकी वितरण प्रणाली बदल रही है। बारिश के दिन घट रहे हैं, लेकिन कम समय में ज्यादा बारिश हो रही है। इससे फ्लैश फ्लड, शहरी जलभराव, अधिक नमी के कारण बढ़ता हीट इंडेक्स और अचानक गर्मी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। विशेषज्ञ इसे उभरती हुई फ्लड-ड्रॉट साइकिल मान रहे हैं, जो भविष्य में और अधिक गंभीर हो सकती है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार जून 2026 में देश में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे यह 1901 के बाद का पांचवां सबसे शुष्क जून बन गया। जुलाई में भी सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई जा रही है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश के दौर भी देखे जा सकते हैं।
जून में मानसूनी हवाएं ज्यादातर समय कमजोर रहीं। मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन यानि एमजेओ अनुकूल स्थिति में नहीं था, उत्तर हिंद महासागर में प्री-मानसून लो-प्रेशर सिस्टम और चक्रवात भी लगभग नहीं बने। इसके साथ ही मजबूत एल-नीनो द्वारा भी मानसून पर दबाव बनाया गया।
जून में देशभर में सामान्य 165 मिमी के मुकाबले मात्र 99 मिमी बारिश हुई जोकि सामान्य से काफी कम है। मानसून केरल में तीन दिन की देरी से पहुंचा और पश्चिम व मध्य भारत में करीब दो सप्ताह तक उसकी प्रगति लगभग रुकी सी रही। इसका सीधा असर खरीफ बुवाई पर पड़ा। साथ ही धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है।
आईएमडी के महानिदेशक के अनुसार देश के अधिकांश हिस्सों में भले ही सूखा या कम बारिश देखने को मिल रही है, परंतु कुछ क्षेत्रों में राहत की उम्मीद जागी है। आईएमडी के अनुसार, जुलाई में दीर्घकालिक औसत यानि एलपीए – 1971-2020 की तुलना में केवल 94 फीसदी बारिश होने की संभावना बन रही है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग, आईएमडी द्वारा जारी किए गए अपने मासिक पूर्वानुमान में कहा गया कि जुलाई के दौरान देशभर में औसत वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार, जुलाई में देशभर में दीर्घकालिक औसत का लगभग 94 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान है।
एलपीए का आशय किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि, जैसे एक महीने या पूरे मौसम के दौरान, 30 से 50 वर्षों के लंबे समय के औसत के आधार पर दर्ज की गई बारिश से है। वर्तमान पूर्वानुमान के लिए 1971 से 2020 की अवधि को आधार बनाया गया है।
आईएमडी के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत, पूर्वोत्तर भारत, पूर्व-मध्य भारत और पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना बन रही है।
आईएमडी के महानिदेशक के मुताबिक जुलाई के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। हालांकि, उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों, पूर्व-मध्य भारत तथा पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्र में सामान्य से सामान्य से अधिक वर्षा होने का अनुमान है।
यह पूर्वानुमान मानसून के मौसम में देश के जल संसाधनों और कृषि गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। किसानों और जल प्रबंधन एजेंसियों को विभाग द्वारा जारी किए गए इन पूर्वानुमानों के आधार पर अपनी योजनाओं को समायोजित करने की सलाह दी गई है।
भारतीय मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों के लिए कई राज्यों के लिए अलर्ट जारी किया है। मौसम विभाग के अनुसार कई क्षेत्रों में तेज हवाओं, मध्यम बारिश, आंधी और बिजली गिरने की संभावना बन रही है। प्रभावित जिलों के लोगों को सतर्क रहने और मौसम संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है।
मौसम विभाग ने ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए बताया है कि कुछ जिलों में 60 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार से तेज हवाएं चल सकती हैं। इसके साथ ही मध्यम बारिश होने और गरज-चमक के साथ बिजली गिरने की संभावना भी बन रही है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड सहित केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में मौसम बदलने की आशंका जताई गई है। मौसम विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे आंधी-तूफान के दौरान पेड़ों, बिजली के खंभों या कमजोर संरचनाओं के नीचे शरण लेने से बचें।
