नई दिल्ली : सड़कों पर आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी दुर्घटनाओं में मुआवजे के भुगतान के लिए एक सिस्टम विकसित करने के निर्देश दिए।
पीठ ने कहा कि शायद यह इस खराब दुनिया की खासियत है कि एक ओर तो हम उन्हें उनकी सुरक्षा की परवाह किए बिना खुला छोड़ देते हैं, और दूसरी ओर, अगर कोई व्यक्ति अपने या अपने परिवार का पेट पालने के लिए उनका इस्तेमाल करता है, तो हमें यह बहुत बुरा लगता है।
पीठ ने कहा कि पालतू जानवरों और दूसरे जानवरों में फर्क स्पष्ट है। इनमें से ज़्यादातर जानवर जो देश की गलियों, सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर घूमते हैं, उन्हें किसी खास मकसद से पाला जाता है। जब वह मकसद पूरा हो जाता है तो उन्हें सड़कों पर छोड़ दिया जाता है।
पीठ ने कहा कि गाय, बैल और दूसरे जानवर इकॉनमी के जरूरी हिस्से हैं। वास्तव में वे न सिर्फ अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि गांव के माहौल और सभी जीवों, खासकर इंसानों के विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं।
पीठ ने कहा कि हमारे संवैधानिक गणराज्य की शुरुआत से ही इस सच्चाई को उचित मान्यता दी गई है। भारतीय संविधान का आर्टिकल 48 हमसे कहता है कि हम खेती और पशुपालन को आधुनिक तरीकों से करें और गायों और बछड़ों को मारने से रोकें।
पीठ ने कहा कि मौजूदा मामला और मोटर एक्सीडेंट के अन्य मामले असल में ‘वध’ नहीं हैं, लेकिन आखिर में नतीजा यह होता है कि या तो वे या इंसान अपनी जान गंवा देते हैं और इसलिए, यह एक गंभीर समस्या है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कहा गया कि वे राष्ट्रीय राजमार्गों, सड़कों और गलियों पर मनमाने ढंग से लगाए गए प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर नहीं हैं।
पीठ ने कहा कि संविधान के तहत, जानवरों के प्रति केवल राज्य की ही जिम्मेदारी तय नहीं है, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक से सभी जीवों के प्रति दया भाव रखने की उम्मीद की जाती है। इसे संविधान के पार्ट IV-A के तहत एक मौलिक कर्तव्य बताया गया है, जो शायद सख्ती से लागू न हो, लेकिन क्योंकि यह संविधान का हिस्सा है, देश को राह दिखाने वाला है, इसलिए इसे लागू करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी करते हुए ये बातें कहीं और कहा कि इन जानवरों के मालिकों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे हर दिन के आखिर में अपने तय घरों में लौट आएं। जिन भी राज्यों ने मवेशियों से जुड़े अपने कानून बनाए हैं, उन्हें यह पक्का करने के लिए कदम उठाने चाहिए कि उन्हें पूर्ण रूप से और तत्काल लागू किया जाए।
पीठ ने कहा कि संबंधित अथॉरिटी को जो सही लगे, उसमें जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं या नियम बनाए जा सकते हैं। यह इसलिए भी जरूरी है ताकि गोजातीय मवेशी की वजह से होने वाले एक्सीडेंट में, दोनों तरह के मामलों में, यानी पैदल चलने वालों या गाड़ियों से होने वाले एक्सीडेंट में मुआवजे के भुगतान का एक सिस्टम विकसित किया जा सके।
पीठ ने कहा कि सभी जानवरों को अनिवार्य रूप से टैग करना चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें ट्रैक करने की क्षमता बढ़ेगी। इससे उन्हें लंबे समय तक हेल्थ सर्विस मिलेगी और उन्हें चेक-अप और वैक्सीनेशन से भी जोड़ा जा सकेगा।
पीठ ने कहा कि इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि आर्थिक मकसद पूरा करने के बाद जानवरों को छोड़ दिया जाता है। ऐसा निर्णय लेने वाले मालिकों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे जानवरों को संबंधित अथॉरिटी द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर में सुरक्षित रूप से भेज दिया जाए।
पीठ ने कहा कि इन शेल्टर की टैगिंग, रिकॉर्ड्स आदि के लिए और इन्हें ठीक से चलाने के लिए, अधिकारी हर निगम/विभाग में एक विशेष ऑफिसर तैनात कर सकते हैं, जो इस काम के लिए नोडल ऑफिसर होगा।
विदित हो कि पीठ ने यह निर्देश एक महिला की अपील पर सुनवाई के दौरान दिए। महिला ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे मिलने वाले 29.32 लाख रुपए के मुआवजे को रद्द कर दिया गया था।
महिला के पति को सड़क पर चलते समय एक आवारा सांड ने टक्कर मार दी जिससे उसके सिर में गंभीर चोट लगने से उसकी मौत हो गई थी। पति की मौत के पश्चात महिला ने उचित मुआवजे की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
सिंगल-जज पीठ ने मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 के तहत मुआवजा देने के नियमों को लागू करते हुए, मृतक/दावेदारों की आय, उम्र और दूसरे आवश्यक फैक्टर्स के आधार पर मुआवजे का निर्णय दिया। हालांकि, डिवीजन पीठ ने सिंगल जज पीठ के आदेश को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला लंबे समय से लंबित है और मरने वाले को दुर्घटना में बहुत ज़्यादा गंभीर चोट लगी थी, इसे देखते हुए हम 15 लाख रुपए की एकमुश्त रकम देना सही समझते हैं और यह रकम चार सप्ताह के भीतर भेज दी जाए।